Journal: शिक्षा संवाद (ISSN: 2348-5558)
Year: 2026 | Volume: 12 | Issue: 2 | Published on: 2025-12-31
लेखक: गोखलेश कुमार
कूटशब्द: स्त्रीकरण,भारतीय शास्त्रीय नृत्य,जेंडर संबंध, पुरुषत्व,सांस्कृतिक पूँजी,जेंडर परफॉर्मेटिविटी, हेजेमोनिक पुरुषत्व,शक्ति संरचना
भारतीय शास्त्रीय नृत्य को समकालीन भारतीय समाज में प्रायः एक स्त्री-प्रधान कला के रूप में देखा जाता है। नृत्य संस्थानों,सांस्कृतिक मंचों और अकादमिक प्रशिक्षण संरचनाओं में महिलाओं की बहुलत्ता ने इस कला को सामाजिक रूप से स्त्रीत्व से संबद्ध कर दिया है। यह शोध-पत्र भारतीय शास्त्रीय नृत्य के स्त्रीकरण की प्रक्रिया का समाजशास्त्रीय विक्ष्लेषण प्रस्तुत करता है। लेख का केंद्रीय तर्क यह है कि यह स्त्रीकरण न तो स्वाभाविक सांस्कृतिक विकास है और न ही केवल महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का परिणाम,बल्कि यह ऐतिहासिक पुनर्गठन, सांस्कृतिक पूँजी के जेंडर-आधारित वितरण,जेंडर परफॉर्मेटिविटी और हेजेमोनिक पुरुषत्व कि संरचनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। जुडिथ बटलर (1990), पियरे बुर्दियू (1977,1986) और आर. डब्ल्यू. कोनेल (2005) के सैद्धांतिक ढाँचों के माध्यम से यह अध्ययन दर्शाता है कि नृत्य का मंच जेंडर पहचान के निर्माण,पुनरुत्पादन और सीमांकन का सक्रिय स्थल है। साथ ही यह विक्ष्लेषण करता है कि स्त्रीकरण कि प्रक्रिया के समानांतर पुरूषों कि घटती भागीदारी सामाजिक संदेह,पहचान संकट और सांस्कृतिक वैधता से किस प्रकार जुड़ी हुई है। यह अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य जेंडर संबंधों के अध्ययन के लिए एक महवपूर्ण विक्ष्लेषणात्मक क्षेत्र प्रदान करता है, जहाँ सशक्तिकरण और नियंत्रण, दृश्यता और सीमाबद्धता,दोनों एक साथ मौजूद रहते
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