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ISSN : 2348-5558

अस्मिता, भाषा और सत्ता (आलेख)

Journal: शिक्षा संवाद (ISSN: 2348-5558)

Year: 2022 | Volume: 9 | Issue: 2 | Published on: 2022-12-31

लेखक: वीरेंद्र कुमार चंदोरिया

कूटशब्द: अस्तित्व, भाषा, सत्ता, स्कूल, पाठ्यक्रम


सारांश


देश की भिन्न-भिन्न भाषाओं के अस्तित्व संबंधी मुद्दे, भाषा की हैसियत से जुड़े सवाल जिनमें भाषा का समाज-सांस्कृतिक तथा आर्थिक प्रभाव भाषा की गतिशीलता, भाषायी वर्चस्व, भाषा और उसके साथ जुड़ी हुई अस्मिता तथा भाषा का राजनीतिकरण, भाषा को एक ऐसा आधर प्रदान करते है जो सतत परिवर्तनीय और बहु-आयामी हो सकता है। इतना ही नहीं इससे इत्तर भी भाषा के साथ जुड़े हुए ऐसे विषय है जैसे भाषा के धु्रवीकरण, वैश्वीकरण तथा भाषा का उपनिवेशवाद, नवउपनिवेशवाद, एवं नव- उदारवाद के साथ रिश्ता, जो हमें भाषा को एक नए ढंग से समझने के लिए प्रेरणा देते रहे है। यदि भारतीय परिवेश और समाज के संदर्भ में बात करे तो भाषा का सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी बुनियाद स्कूल में है, चूंकि भारत एक बहुभाषिक और बहु-सांस्कृतिक राष्ट्र है इस नाते देश की शिक्षा पद्धति के समक्ष विभिन्न भाषाओं और उनसे जुड़े प्रश्न कई चुनौतियाँ प्रस्तुत करते है । स्कूल एक संस्थानिक हैसियत रखने वाली संस्था होती है इसलिए इस क्षेत्र में क्या, कैसे और किस प्रकार होता है उसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता और इसे अधिक गहराई से जाँचने की जरूरत है। दरअसल भाषा के साथ अस्मिता तथा व्यक्तित्व की धरणाएँ जुड़ी होती है तथा कक्षाओं में हमने पाया है कि शिक्षक जाने-अनजाने अपनी पूर्व धरणाओं के साथ कक्षाओं में आते हैं जिनमें वह तमाम धरणाएँ विश्वास और मूल्य समाहित होते है जिसकी तलहटी में वर्गों, जातियों, समुदायों को ढूँढा जा सकता है जो ज्यादातर आपसी सम्बन्धें में व्याप्त होते है। परिणाम स्वरूप भाषा सत्ता, पहचान और राजनीति के एक ऐसे उपकरण के रूप में कार्य प्रयुक्त होने लगती है जो हमे एक करने के बजाए अलग करने लगती है। प्रस्तुत पर्चे का मूल उद्देश्य इन्ही समीकरणों की तलाश करना है ।

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